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वेदों में चिकित्सा और मानव स्वास्थ्य
March 30, 2020 • सुरेश चौरसिया

**    वेदों में माइक्रोबायोलॉजी मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण 

अरुण उपाध्याय की कलम से

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भारतीय परम्परा में यह विश्वास पाया जाता है कि सृष्टि के आदिकाल में ऋषियों द्वारा समस्त ज्ञान विज्ञान पर  आधारित परा और अपराविद्या का मानव को श्रेष्ट जीवन पद्धति के आधार का उपदेश वेदों में दिया गया था |  वेदों में प्रकृति के समस्त रहस्यों पर आधारित मानव के हित में जीवन शैलि का पूर्ण उपदेश मिलता है | पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव से वैदिक परम्परा को अंधविश्वास और अश्रद्धा के कारण आज का मानव प्रकृति के रहस्यों को अपने प्रयास से पुन: खोजने का प्रयास कर रहा है |  


इसे आधुनिक वैज्ञानिक Modern Science परम्परा का नाम दिया जाता है  |  आधुनिक विज्ञान की परम्परा जो केवल गत तीन चार शताब्दि से प्रकृति के मूल सिद्धांतो के रहस्य  का अनुसंधान करने में जुटी है, परंतु अंतिम सत्य तक  कब पहुंचेगी यह भविष्य ही बताएगा |  अनेक ऐसे उदाहरण अब दिए जा सकते हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि वैदिक ज्ञान ही अंतत: अत्याधुनिक विज्ञान सिद्ध होता है |  
जैसे आधुनिक भौतिकी वैज्ञान की  सोच इतिहास में न्यूटोनियन यांत्रिकी ,  डेसकार्टेस   की 'यंत्रवत’  दुनिया से आइंस्टीन के सापेक्षता तक  एक सतत विकास के रूप में देखा जाता है |
इसी  तरह के जैव विज्ञान कृषि खाद् पदार्थ इत्यादि के विकास के रूप में मिट्टी में अकार्बनिक रासायनिक उर्वरकों Chemical Fertilizers से आगे चल कर सूक्ष्म जीवाणुओं,  जैविक खाद इत्यादि के  विकास का क्रम भी देखा जाता है |

चिकित्सा के क्षेत्र में इसी प्रकार आरम्भ में सब जैव सूक्ष्माणुओं को विभिन्न रोगों के लिए ज़िम्मेदार समझा जाता था  परन्तु  फिर यह भी पाया गया कि पृथ्वी पर समस्त  जीवन का आधार ही सूक्ष्म जीवाणु  हैं  और  सब सूक्ष्म जीवाणु  केवल रोगों के लिए ही ज़िम्मेदार नहीं हैं | रोगाणुओं से  अधिक महत्व और संख्या  जीवन दायिनी  सूक्ष्माणुओं Probiotics प्रबायोटिक्स की है |  मनुष्य की पाचन क्रिया  और स्वास्थ्य तो इन्हीं जीवन दायिनी सूक्ष्माणुओं  Probiotics पर निर्भर है | और अब रोगाणुओं से अधिक महत्व जीवन दायिनी सूक्ष्माणुओं  Probiotics को दिया जा रहा है | आज समस्त बुद्धिजीवी  जैविक  स्वच्छ अन्न ही मांग रहे हैं |
रोगों के उपचार  के रूप में दवाओं की खोज से  बीमारी से लड़ने के उपकरण के रूप में एंटीबायोटिक दवाओं और टीकों का आविष्कार किया गया |  परंतु वायरस से  लड़ने के  अभी तक कुछ भी नहीं मिला था |  अब बेक्टीरियोफेज बेक्टीरिया को खा जाने वाले बेक्टीरिया से भी सूक्ष्म तत्व पाए गए हैं  |
इस प्रकार सूक्ष्माणुओं का जैविक विज्ञान में जो स्थान है वही अणुओं परमाणुओं का भौतिक विज्ञान में है | संख्या के अनुसार सूक्ष्माणुओं  भी परमाणुओं की तरह असंख्य बताए जाते हैं | 
वेदों में इन  जैव सूक्ष्माणुओं  को  पदार्थ विद्या के अंतर्गत मरुद्गणों के नाम से बताया गया है | 
वेदों के अनुसार मरुद्गणों में वे अब गुण पाए जाते हैं जो  आधुनिक सूक्ष्म विज्ञान में Microbiology  में   सूक्ष्माणुओं  microbes में पाए जाते हैं |
1. वेदों के अनुसार गौ में विश्व  की सब  से अधिक रोगाणुओं को रुलाने की क्षमता है | गौमाता को वेदों मे ‘ माता रुद्राणाम्‌’ कहा गया है | आज वैज्ञानिक  अनुसन्धान से  यह पाया गया  है कि गौ प्रजाति में विश्व के सब प्राणियों से  अधिक जैविक रोग निरोधक और रोग नाशक शक्ति है |
2. ये रुद्र मरुद्गण इतने  सूक्ष्म भी होते हैं कि इन्हें अतिसूक्ष्म तत्व वायरस VIRUS जैसा बताया जाता है  | इन्हें आधुनिक विज्ञान बेक्टीरियोफेज –बेक्टीरिया खा जाने वाले - नाम देता है | बेक्टीरियोफेज अतिसूक्ष्म तत्व वायरस VIRUS की तरह अति  सूक्ष्म और संक्रामक होते हैं यानी ये बेक्टीरिया से भी जल्दी स्वयं फैल जाते हैं  और अब रोगो को नष्ट कर देते हैं |  बेक्टीरियोफेज इतने प्रभावशाली पाए गए हैं कि जो रोगाणु अब आधुनिक एन्टीबायोटिक से भी नष्ट नहीं हो पाते वे बेक्टीरियोफेज से नष्ट हो जाते हैं  | पवित्र गंगा जल और स्वच्छ मट्टी में भी  वैज्ञानिकों को  यह बेक्टीरियोफेज  मिले हैं |  आधुनिक विज्ञान की विदेशों में खोज पर ध्यान  दें तो वहां गौ माता के पन्चगव्य , गंगा जल और मट्टी के  द्वारा हर उस रोग का निदान सम्भव है जो किसी भी एन्टीबायोटिक से भी ठीक नहीं हो पाता | अब अमेरिका की  व्यापारिक संस्थाएं गंगा जल के अनुसंधान से एंटीबायोटिक से भी अधिक प्रभावशाली ओषधियां बना कर उन्हें भारत वर्ष में ही बेचने का कार्य कर रही हैं  | 
हमारा दुर्भाग्य यह है कि पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव में भारतीय जीवन शैलि की अवहेलना और वैदिक मान्यताओं  के प्रति अश्रद्धा के कारण आज भारत वर्ष में हमने पवित्र गंगा माता में समस्त मल मूत्र इत्यादि छोड़ कर एक भयंकर रोगाणुओं से लदा गंदा नाला बना दिया है | अमेरिका की वैज्ञानिक शोध के अनुसार भारत वर्ष की समस्त नदियों समस्त गंगा यमुना इत्यादि नदियों में केंसर के रोगाणु पल रहे हैं | इन नदियों के जल पर  आधारित समस्त कृषि और मछलिया इत्यादि समस्त भारत वर्ष को केंसर जैसे रोगों की महामारी की भूमिक  निभा रहे हैं | 
माननीय मोदी जी  के गंगा यमुना और स्वच्छ भारत अभियान के महत्व को जन साधारण तब तक नहीं समझेगा जब तक  हमारी शिक्षा पद्धति को पाश्चात्य सिद्धांतों  से दूर नहीं किया जाएगा |  
3. इसी प्रकार वर्षा विज्ञान को जो एक समय केवल   जल का पृथ्वी से सूर्य के ताप  वाष्पीकरण द्वारा मेघ बन आकाश में ऊपर उठ कर  ठंडा होने से  पृथ्वी पर गिरना एक भौतिक कृया के रूप में देखा जाता था  परंतु अब यह समझ में आ रहा है कि , पृथ्वी  पर होने वाली हरयाली में सड़ने वाले उर्वरक में एक सूक्ष्माणु ( Pseudomonas Syringe) अग्निहोत्र की ऊष्णता के कारण आकाश में उड़ कर जाता है और मेघों को वर्षा करने के लिए प्रेरित करता है | यह विज्ञान  अग्निहोत्र के लाभ के रूप में अनेक स्थलों पर वेदों में दिया गया है जैसे  यजुर्वेद 17.3 |जहां हरयाली न हो वहां  वर्षा कम होने लगतीहै और वह प्रदेश मरुस्थल बन जाता है |
आधुनिक माइक्रोबाइलोजी  से  सम्मत वेदों के मरुद्गण विषय पर कुछ  और उदाहरण यहां दिए जा रहे हैं |
1.Maruts  वेद  में  मारुत ganas एक सेना का रूप हैं जो एक संगठित सेना की तरह  संचालित होते हैं | माइक्रोब भी अकेले नहीं परंतु एक विशाल समूह के रूप में काम करते हैं |  
2.नवीन उर्वरक मृदा विज्ञान  - Virgin alluvial soil formation
एक Yajur वेद मंत्र 17-1 जैविक उपजाउ भूमि की संरचना में मद्गणों का दायित्व बताते हुए पर्वतों की चट्टानों में भिन्न भिन्न खनिज पदार्थों के बने पत्थरों के विदीर्ण कर के नूतन उपजाउ मृदा खनिज पदार्थों का रस बना कर पेड़ - पौधों की जड़ों से वनस्पतियों की वृद्धि और ओषधीय गुण प्रदान करने की बात एक अत्यंत आधुनिक उपजाउ मृदा संरचना Alluvial Soil formation का ज्ञान देती है | आधुनिक विज्ञान भी कुंवारी उपजाऊ मिट्टी के गठन के लिए चट्टानों के अपक्षय और विघटन में सूक्ष्माणुओं  microbes की महत्वपूर्ण भूमिका मानता है |
3. सूक्ष्माणुओं  microbes की संख्या
वेद मरुद्गणों को इस सजीव सृष्टि की अट्टालिका में ईंटों की तरह देखता है |
 (Yajurved 17.2) में मरुद्गणों की संख्या 10 32  ले जाता है |  आधुनिक माइक्रोबायलोजी के अनुआर भी सूक्ष्माणुओं  microbes की अनुमानित संख्या 10 32  है |
4.  Yaju 17.4 मरुद्गण वे समुद्र के तल पर ज्वालामुखी विस्फोट के आसपास के क्षेत्र में बहुत उच्च तापमान पर मौजूद है, जहां समुद्र के फर्श, पर उनकी मौजूदगी से खेलते भूमिकाओं कि संकेत मिलता है। इन्हें Thermophilic microbes कहते हैं | 
5. Yaju17.5 मरुद्गण में गहरी बहुत कम तापमान के नीचे बर्फ के नीचे दबे 
जीवाणुओं  का संकेत कर रहे हैं। इन्हें Cryophilic microbes  कहते हैं | 

6. वेदों में मरुद्गण जैव प्रौद्योगिकी, सूक्ष्म जीव विज्ञान, रोगाणुओं के विषय 
को विस्तृत रूप से प्रकट ही नहीं करते हैं , परंतु आधुनिक विज्ञान  की एक रहस्य मयी पहेली को भी सुलझाते हैं |वेद मरुत का निर्जीव पदार्थ और जीवन  Inorganic & Organic में सम्बंध भी दिखाते हैं जहां आधुनिक विज्ञान की पहुंच अभी नहीं है | वेद प्राण द्वारा हवा में मरुद्गण से ही 'जीवन'  की उपलब्धता बताते हैं | मरुतः प्राणेन (अवकीर्णः प्रविशति), मरुतः प्राणैः (सहास्मिन् कर्मण्यागच्छन्तु)
            
7 ..Maruts  मरुद्गण वेदों के अनुसार कई विभिन्न किस्मों, आकृति, आकार और रंग  के हैं | यह भी माक्रोबयलोजी से सम्मत है |
  
9. वेदोंके अनुसार मरुद्गणों का जन्मस्थान बाह्य अंतरिक्ष में है . माइक्रोबायलोजी microbes का जन्म स्थान यही मानती है | मरुत Microbes आकाश –अंतरिक्ष से वे पृथ्वी पर वायु मंडल से  प्रवेष  करते हैं |
10 . मरुद्गण जन्म से ही युवा वयस्क पैदा होते हैं  वे बचपन और बुढ़ापे तरह के चरणों से नहीं गुज़रते और एक साथ ही मर जाते हैं  माइक्रोबायलोजी भी माइक्रोब्स के बारे में यही कहती है | 
  
11. वैज्ञानिक microbes को देखने में अलग चमकदार बहुरंगा, आकृति और आकार के पाते हैं | वैदिक मरुद्गण भी इसी तरह के हैं । वेदों के अनुवाद में ग्रिफ़िथ मरुतो को अपने दुश्मनों से लड़ने के लिए, अपने हथियार के साथ देदीप्यमान बहुरंगी Bejeweled पदकों के साथ दर्शाता है।
  
12. मरुद्गण  एक शंख shell- Shankh-नाद में भी होते हैं , जो बुरे रोगणुओं को नष्ट करने के लिए पवित्र स्थान को शंख ध्वनि से शुद्ध रखते हैं |
  
13.. मरुद्गण आग, शारीरिक घर्षण, विद्युत चिंगारी के दौरान पैदा होते हैं  और संचालित 
रहते हैं | 
  
14. यजु में मरुद्गण पकाए गए भोजन का भक्षण करके शीघ्र  गति से अपनी संख्या बढ़ाते हैं | इस प्रक्रिया को Fermentation के नाम से जाना जाता है | 
  15. यजु में रुद्र के रूप में मरुद्गण हानिकर जीवों को नष्ट करने  के लिए सीवेज और दूषित पानी का भी प्रबंध करते हैं | 
  16 . मरुद्गण पृथ्वी पर बादल से बारिश लाने (स्यूडोमोनास सिरिंगे ) के द्वारा कृत्रिम बारिश का उत्पादन कर सकते हैं। इसे वृष्टि यज्ञ द्वारा इच्छानुसार वर्षा कराइ जाती है 
 17 . मरुद्गण धरती के नीचे बड़ा आवाज़ पैदा करते हैं। इन पृथ्वी मिलते हुए शोर सुन रहे  पशु, पक्षी पृथ्वी में भूकम्प earth quakes जैसी प्राकृतिक आपदाओं का पूर्व अनुमान  लगा लेते हैं  ( वेद यहां  पृथ्वी में ambient noise monitoring से बड़े भूकंप का जल्दी पता लगाने के लिए एक विधि का सुझाव दे रहा है ..)
18. मरुद्गण गौ  के द्वारा भूमि की उर्वरकता की रक्षा इस प्रकार करते हैं कि किसी रासायनिक उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती | और इस प्रकार जैविक कृषि में किसी कीटनाशक की भी आवश्यकता नहीं रहती | 
19. गौ आधारित  कृषि और जीवन शैलि से मरुस्थल नहीं बनते | सब स्थान समय पर उचित वर्षा पाते है| कृषि के लिए कृत्रिम सिंचाइ की भी आवश्यकता  नहीं रहती |  अभी गत पचास वर्षों में Allan Savory द्वारा अफ्रीका में नष्ट हो रहे वन प्रदेशों को गौओं द्वारा पुन: हरा भरा कर के यह सिद्ध किया है कि वैदिक परम्परा में ऊसर भूमि को गौओं द्वारा पुन: हरा भरा करना एक वैज्ञानिक तथ्यहै |  
आधुनिक जीवन की समस्तभौतिक व्याधियों महामारी की तरह बढ़ते नए नए केंसर  , डायबीटिज़ , हृदयरोग इत्यादि अब दूर की बात होंगे यदि हम पुन: पाश्चात्य परम्परा के स्थान पर वैदिक ज्ञान और जीवन शैलि के आधार पर प्रेरित समाज बना पाएंगे |

आयुर्वेद में वायरस चिकित्सा-
१. वायरस के नाम और आकार-वायरस के वेद में कई नाम हैं-कृमि या क्रिमि (सूक्ष्म अदृश्य या दृश्य), राक्षस (रक्षोहा), पिशाच, यातु, यातुधान, किमिदि, गन्धर्व, अप्सरा, अमीवा, दुराणामा, असुर, आतंक। सबसे छोटे जीव का आकार बालाग्र का १०,००० भाग कहा है-वालाग्र शत भागस्य शतधा कल्पितस्य च ॥
भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ५/९)
बालाग्र = माइक्रोन (मीटर का १० लाख भाग)। उसका १०,००० भाग ऐंगस्ट्रम होगा जो परमाणु या सबसे छोटे वायरस की माप है। परमाणु किसी कल्प (रचना) में नष्ट नहीं होता जो इस श्लोक में कहा है।
यह बालाग्र का १ लाख भाग भी हो सकता है-वालाग्र शत साहस्रं तस्य भागस्य भागिनः। तस्य भागस्य भागार्धं तत्क्षये तु निरञ्जनम् ॥ (ध्यानविन्दु उपनिषद् , ४)
अमीवा का उल्लेख यजुर्वेद (सभी संहिता) के प्रथम मन्त्र में ही है-ॐ इ॒षे त्वो॑र्जे त्वा॑ वा॒यव॑ स्थ दे॒वो वः॑ सवि॒ता प्रार्प॑यतु आप्या॑यध्व मघ्न्या॒ इन्द्रा॑य भा॒गं प्र॒जाव॑तीरनमी॒वा अ॑य॒क्ष्मा मा व॑ स्तेन ई॑षत माघशँ॑सो ध्रुवा अ॒स्मिन् गोप॑तौ स्यात ब॒ह्वीर्यजमा॑नस्य प॒शून्पा॑हि (वा. यजु १/१)
यहां अनमीवा (अमीवा या वायरस से मुक्त), अयक्ष्मा (यक्ष्मा से मुक्त) तथा माघशँस (पाप जनित रोग से मुक्त) का उल्लेख है। यह यज्ञ के लिये यजुर्वेद का एक उद्देश्य है कि स्वस्थ रहें। स्वस्थ और सम्पन्न रहने के लिये अघ्न्या (गो) की उपासना भी जरूरी है। अघ्न्या गो के कई अर्थ हैं-(१) गो रूपी पृथ्वी को सुरक्षित रखना, (२) गो रूपी इन्द्रिय स्वस्थ रखना, (३) गो रूपी यज्ञ का क्रम सनातन रखना-केवल उसका बचा हुआ भोग करना है, (४) तथा गो रूप पशु की रक्षा जिसके उत्पाद पर हम जन्म से मृत्यु तक निर्भर हैं।
२. स्वास्थ लाभ २१ दिन में-शरीर का पाचन तन्त्र तथा मांस पेशियों का पुनर्निर्माण २१ दिन में हो जाता है। अतः कोई योगिक या अन्य व्यायाम का प्रभाव २१ दिनों में दीखता है। दौड़ने या अन्य व्यायाम में प्रथम सप्ताह में बहुत कम से आरम्भ होगा, द्वितीय सप्ताह में थोड़ा थोड़ा बढ़ेगा, तथा तृतीय सप्ताह में पूरा क्रम होगा।
३. पुत्रेष्टि यज्ञ-रामायण में २ बार पुत्र प्राप्ति के लिए अश्वमेध का उल्लेख है। राजा दिलीप को यक्ष्मा हुआ था तो पुत्र प्राप्ति के लिए नन्दिनी गौ की २१ दिनों तक सेवा की। यहां अश्वमेध का अर्थ आन्तरिक अश्वमेध है। अश्व = क्रियात्मक प्राण। शरीर की नाड़ियों में इसके सञ्चार की बाधा दूर करना आन्तरिक अश्वमेध है। राज्य के भीतर यातायात तथा सञ्चार अबाधित रखना चक्रवर्त्ती राजा का कर्तव्य है जो आधिभौतिक अश्वमेध है। पृथ्वी की सभी क्रियाओं का स्रोत सूर्य का तेज है, अतः सूर्य को भी अश्व कहा गया है।
दिलीपस्तु महातेजा यज्ञैर्बहुभिरिष्टवान्। त्रिंशद् वर्षसहस्राणि राजा राज्यमकारयत्॥८॥
अगत्वा निश्चयं राजा तेषामुद्धरणं प्रति। व्याधिना नरशार्दूल कालधर्ममुपेयिवान्॥९॥ (रामायण १/४२)
इत्थं व्रतं धारयतः प्रजार्थं समं महिष्या महनीय कीर्त्तेः।
सप्तव्यतीयुस्त्रिगुणानि तस्य दिनानि दीनोद्धरणोचितस्य॥ (रघुवंश २/२५)
सौर्यो वा अश्वः (गोपथ ब्राह्मण, उत्तर, ३/१९)
राजा दशरथ तथा उनकी रानियां वृद्ध हो गये थे, अतः उनके शरीर को पुत्र जन्म योग्य बनाने के लिये अश्वमेध यज्ञ हुआ। यहां पुत्र कामेष्टि यज्ञ को अश्वमेध कहा गया है। यहां २१ दिन का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, पर २१ यूप २१-२१ अरत्नि के थे-
पुत्रार्थं हय (=अश्व) मेधेन यक्ष्यामीति मतिर्मम॥ तदहं यष्टुमिच्छामि हयमेधेन कर्मणा॥ (रामायण १/१२/९)
इसमें २१ स्तम्भ विभिन्न ३ प्रकार के काष्ठों के बनते हैं (रामायण १/१४/२२-२७)-
एकविंशति यूपास्ते एकविंशत्यरत्नयः। वासोभिरेकविंशद्भिरेकैकं समलंकृताः॥२५॥
यहा रघुवंश में २१ दिनात्मक यज्ञ को ३ गुणा ७ कहा गया है।
४. विष या कृमि से २१ दिन में मुक्ति-सूक्ष्म कृमि वायरस है। उससे या विष से शरीर की रक्षा एक ही प्रकार की क्रिया है। इसे दूर करने के लिए ऐण्टीबायोटिक भी एक विष ही है जो वायरस रूपी अन्य विष को नष्ट करता है-विषस्य विषमौषधम्। उसके कुप्रभाव से शरीर को सामान्य होने में २१ दिन लगता है, यह शरीर की शक्ति, आयु या मौसम पर निर्भर है। अष्टाङ्ग संग्रह में २१ दिन तथा सुश्रुत संहिता में १५ दिन में रोग से मुक्ति कही है।
अष्टाङ्ग हृदय, उत्तर स्थान, अध्याय ३७-श्वास दंष्ट्रा शकृन् मूत्र शुक्र लाला नखार्तवैः॥५८॥
अष्टाभिरुद्धमत्येषा विषं वक्राद् विशेषतः। लूता नाभेर्दशत्यूर्ध्व चाधश्च कीटकाः॥५९॥
तद्दूषितं च वस्त्रादि देहे पृक्तं विकारकृत्। दिनार्धं लक्ष्यते नैव दंशो लूता विषोद्भवः॥६०॥
सूची व्यघवदाभाति ततोऽसौ प्रथमेऽहनि। अव्यक्तवर्णः प्रचलः किञ्चित् कण्डूरुजान्वितः॥६१॥
द्वितीये ऽभ्युन्नतोऽन्तेषु पिटिकैरिव वाऽऽचितः। व्यक्त वर्णो नतो मध्ये कण्डूमान् ग्रन्थि सन्निभः॥६२॥
तृतीये स ज्वरो रोमहर्षकृद् रक्तमण्डलः। शराव रूपस्तोदाख्यो रोमकूपेषु सास्रवः॥६३॥
महाश्चतुर्थे श्वयथुस्ताप श्वास भ्रमप्रद। विकारान् कुरुते तास्तान् पञ्चमे विषकोपजान्॥६४॥
षष्ठे व्याप्नोति मर्माणि सप्तमे हन्ति जीवितम्। इति तीक्ष्णं विषं मध्यं हीनं च विभजेदतः॥६५॥
एकविंशति रात्रेण विषं शाम्यति सर्वथा॥६६॥
सुश्रुत संहिता, कल्प स्थान, अध्याय ८ में भी ऐसा ही वर्णन है। वायव्य कीट १८ प्रकार के हैं जिनमें वायरस भी है। इनकी चिकित्सा विष चिकित्सा जैसी है। यहां इनसे स्वस्थ होने का समय १ पक्ष (१५ दिन लिखा है)। कान्यकुब्ज के राजा विश्वामित्र तथा वसिष्ठ के संघर्ष में भी कई प्रकार के महाविष उत्पन्न हुए थे। यह आजकल के जैव-रसायन युद्ध की तरह था।
सर्पाणां शुक्रविण्मूत्र शवपूत्यण्डसम्भवाः। वाय्वग्न्यम्बु प्रकृतयः कीटास्तु विविधाः स्मृताः॥३॥
शतबाहुश्च यश्चापि रक्तराजिश्च कीर्तितः। अष्टादशेति वायव्याः कीटाः पवन कोपनाः॥७॥
(पवन कोपन कीट-मलेरिया, Mal+air =दूषित वायु)
खेभ्यः कृष्णं शोणितं याति तीव्रतस्मात् प्राणैस्त्यज्यते शीघ्रमेव॥६६॥
ईषत् सकण्डु प्रचलं सकोठमव्यक्तवर्णं प्रथमेऽहनि स्यात्।
अन्तेषु शूनं परिनिम्नमध्यं प्रव्यक्तरूपं च दिने द्वितीये॥८०॥
अतोऽधिकेऽह्नि प्रकरोति जन्तोर्विषप्रकोप प्रभवान् विकारान्॥८१॥
षष्ठे दिने विप्रसृतं तु सर्वान् मर्मप्रदेशान् भृशमावृणोति।
तत् सप्तमेऽत्यर्थ परीतगात्रं व्यापादयेन्मर्त्यमतिप्रवृद्धम्॥८२॥
यास्तीक्ष्ण चण्डोग्रविषा हि लूतास्ताः सप्तरात्रेण नरं निहन्युः।
अतोऽधिकेनापि निहन्युरन्या यासां विषं मध्यमवीर्यमुक्तम्॥८३॥
यासां कनीयो विषवीर्यमुक्तं ताः पक्षमात्रेण विनाशयन्ति॥८४॥
विश्वामित्रो नृपवरः कदाचिद् ऋषिसत्तमम्।
वसीष्ठं कोपयामास गत्वाऽऽश्रमपदं किल॥९०॥
कुपितस्य मुनेस्तस्य ललाटात् स्वेदविन्दवः। अपतन् दर्शनादेव रवेस्तत्सम तेजसः॥९१॥
ततो जातास्त्विमा घोरा नाना रूपा महाविषाः।
अपकाराय वर्तन्ते नृपसाधनवाहने॥९१॥
५. यक्ष्मा आदि रोग-चरकसंहिता, चिकित्सितस्थान, अध्याय ३ (श्लोक १४-२५) में परिग्रह (अन्न धन का अधिक सञ्चय) से रोग उत्पत्ति कही गयी है। द्वितीय युग में दक्ष यज्ञ के समय महेश्वर के क्रोध से उनका रुद्र रूप हुआ और तृतीय नेत्र से अग्नि निकली। शान्त होने पर शिव रूप हुआ तथा उस अग्नि का ज्वर रूप में जन्म हुआ। मन में क्रोध आदि विकार होने से ज्वर होता है। सुश्रुत संहिता, उत्तर तन्त्र (४१/५) के अनुसार राजा चन्द्र को सबसे पहले यक्ष्मा हुआ था, अतः इसे राजयक्ष्मा कहते हैं। दक्ष की २८ पुत्रियों (अभिजित् सहित २ नक्षत्र) का विवाह चन्द्र से हुआ किन्तु चन्द्र केवल रोहिणी से प्रेम करते थे। अतः दक्ष शाप से उनको यक्ष्मा हुआ। अधिक विलास पूर्ण जीवन यक्ष्मा का कारण है। (अथर्व संहिता, ७/७६/३-६) टायफाइड अंग्रेजी नाम है जिसे मधुरक, सन्निपात या आन्त्रिक ज्वर कहते थे क्योंकि यह आन्त्र में कृमि प्रकोप से होता है। यह २१ दिनों में ठीक होता है अतः इसे मियादी बुखार भी कहते थे (मियाद = अवधि)।