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वाल्मीकि से पहले हनुमानजी ने लिखा था रामायण
February 25, 2020 • सुरेश चौरसिया
हनुमान जी आज भी जनमानस के संकटों को दूर कर रहे हैं तथा युवाओं व समाज के लिए अद्भुत प्रेरणास्रोत भी हैं। मान्यता है कि हनुमान जी बुद्धि, बल, वीर्य प्रदान करके भक्तों की रक्षा करते हैं। हनुमान जी के स्मरण से रोग, शोक व कष्टों का निवारण होता है। मानसिक कमजोरी व दुर्बलता के दौर में हनुमान जी का स्मरण करने मात्र से जीवन में नये उत्साह का संचार होता है।
 
हनुमानजी के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनमें अहंकार रंचमात्र नहीं था। वे सदा श्रीराम व उनके परिवार के सभी सदस्यों सहित अपने गुरु, माता−पिता तथा साधु−संतों के प्रति नतमस्तक रहते थे। आज के युवावर्ग व सत्ता प्रतिष्ठान में यह चीज नहीं रह गयी है।
 
हनुमानजी ने जब माता सीता की खोज के लिए रावण के अंतःपुर में प्रवेश किया और रावण की स्त्रियों और उनकी सुंदरता को देखा तब भी उनका मन व विचार स्खलित नहीं हुआ। जिसका वर्णन स्वयं हनुमान जी ने किया है। यह विचार आज के युवा वर्ग में जाना अत्यंत जरूरी है क्योंकि आज का युवा विदेशी सभ्यता के जाल में फंसता चला जा रहा है और अपनी संस्कृति से दूर होकर अपनी अवनति को बढ़ावा दे रहा है। हनुमान जी नारियों के प्रति सम्मान का भाव रखते थे। लेकिन आज के समाज में नारी सम्मान का भाव गिरता जा रहा है तथा समाज में नारी से सम्बंधित अपराधों में वृद्धि होती जा रही है।
 
हनुमान जी का जीवन चरित्र उच्च आदर्शों वाला था। उनका जीवन व भक्ति निःस्वार्थ थी। उन्हें देवताओं की ओर से वरदान प्राप्त थे। वे कलियुग के सबसे जाग्रत देवता हैं। 

 प्रभु श्री राम के जीवन पर अनेकों रामायण लिखी गई है जिनमे प्रमुख है वाल्मीकि रामायण, श्री राम चरित मानस, कबंद रामायण (कबंद एक राक्षस का नाम था), अद्भुत रामायण और आनंद रामायण। लेकिन क्या आप जानते है अपने आराध्य प्रभु श्री राम को समर्पित एक रामायण स्वयं हनुमान जी ने लिखी थी जो ‘हनुमद रामायण’ के नाम से जानी जाती है। इसे ही प्रथम रामायण होने का गौरव प्राप्त है। लेकिन स्वयं हनुमान जी ने ही अपनी उस रामायण को समुद्र में फ़ेंक दिया था।  लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों किया आइये जानते है शास्त्रों में वर्णित एक गाथा-

शास्त्रों के अनुसार सर्वप्रथम रामकथा हनुमानजी ने लिखी थी और वह भी एक शिला (चट्टान) पर अपने नाखूनों से लिखी थी। यह रामकथा वाल्मीकिजी की रामायण से भी पहले लिखी गई थी और यह ‘हनुमद रामायण’ के नाम से प्रसिद्ध है।

यह घटना तब की है जबकि भगवान श्रीराम रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद अयोध्या में राज करने लगते हैं और श्री हनुमानजी हिमालय पर चले जाते हैं। वहां वे अपनी शिव तपस्या के दौरान एक शिला पर प्रतिदिन अपने नाखून से रामायण की कथा लिखते थे। इस तरह उन्होंने प्रभु श्रीराम की महिमा का उल्लेख करते हुए ‘हनुमद रामायण’ की रचना की।

कुछ समय बाद महर्षि वाल्मीकि ने भी ‘वाल्मीकि रामायण’ लिखी और लिखने के बाद उनके मन में इसे भगवान शंकर को दिखाकर उनको समर्पित करने की इच्छा हुई। वे अपनी रामायण लेकर शिव के धाम कैलाश पर्वत पहुंच गए। वहां उन्होंने हनुमानजी को और उनके द्वारा लिखी गई ‘हनुमद रामायण’ को देखा। हनुमद रामायण के दर्शन कर वाल्मीकिजी निराश हो गए।

वाल्मीकिजी को निराश देखकर हनुमानजी ने उनसे उनकी निराशा का कारण पूछा तो महर्षि बोले कि उन्होंने बड़े ही कठिन परिश्रम के बाद रामायण लिखी थी लेकिन आपकी रामायण देखकर लगता है कि अब मेरी रामायण उपेक्षित हो जाएगी, क्योंकि आपने जो लिखा है उसके समक्ष मेरी रामायण तो कुछ भी नहीं है।

तब वाल्मीकिजी की चिंता का शमन करते हुए श्री हनुमानजी ने हनुमद रामायण पर्वत शिला को एक कंधे पर उठाया और दूसरे कंधे पर महर्षि वाल्मीकि को बिठाकर समुद्र के पास गए और स्वयं द्वारा की गई रचना को श्रीराम को समर्पित करते हुए समुद्र में समा दिया। तभी से हनुमान द्वारा रची गई हनुमद रामायण उपलब्ध नहीं है।

हनुमानजी द्वारा लिखी रामायण को हनुमानजी द्वारा समुद्र में फेंक दिए जाने के बाद महर्षि वाल्मीकि बोले कि हे रामभक्त श्री हनुमान, आप धन्य हैं! आप जैसा कोई दूसरा ज्ञानी और दयावान नहीं है। हे हनुमान, आपकी महिमा का गुणगान करने के लिए मुझे एक जन्म और लेना होगा और मैं वचन देता हूं कि कलयुग में मैं एक और रामायण लिखने के लिए जन्म लूंगा। तब मैं यह रामायण आम लोगों की भाषा में लिखूंगा।

कहा गया कि संत तुलसीदास के रूप में कलियुग में वाल्मीकि का ही स्वरूप है और वे जनमानस के लिए रामायण की रचना कर अमर हो गए। तुलसी कृत रामायण की विशेषता है कि एक- एक चौपाई का अर्थान्तरण लाखों-करोड़ों में होने के बाद भी अर्थ की गहराइयों में पहुंचना मुश्किल हो जाता है। आज तुलसीदास कृत रामायण सरल भाषा में जनग्राह्य है।