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शराबी का हाई वोल्टेज ड्रामा, शराब के लिए आगरा डीएम आवास के सामने चढ़ गया बिजली पोल पर
May 1, 2020 • सुरेश चौरसिया

नोएडा। देश-दुनिया में किस्म- किस्म के लोग हैं। हर का अपना व्यवहार व नजरिया है। इन दिनों शराबियों का हाई वोल्टेज ड्रामा कहीं-कहीं देखने सुनने को मिल रहा है। यह देश भारत है और यहां लोकतंत्र है। यहाँ सभी के पास अपने-अपने पक्ष रखने का अधिकार है। हर कोई प्रशासन के सामने अपनी समस्या को रख सकता है। प्रशासन के पास भी अपने अधिकार और कर्तव्य हैं कि पूरा करे या न करे। खैर, यह तो प्रशासन के ऊपर छोड़ देते हैं ।

लेकिन हम बात करते है आगरा के जिलाधिकारी आवास के बाहर हुए कल एक हाई वोल्टेज ड्रामे की। एक नागरिक ने शराब और गुटखा के मांग को लेकर बिजली के खंभे के ऊपर चढ गया और प्रशासन को धमकी दिया की अगर उसकी मांग पूरा नहीं हुआ तो वह बिजली के खंभे से कूद कर जान दे देगा, लेकिन उसे शराब की बोतल चाहिए। इस बाबत एक विडियों सोशल मीडिया पर साफ साफ देखा जा सकता है। पुलिस अधिकारी यह भी कह रहे हैं कि वह काफी देर तक ड्रामा करता रहा।

 एक जानकारी के मुताबिक इस देश में सबसे ज्यादा टैक्स शराब के माध्यम के वसूला जाता है। इसका यह मतलब निकलता है कि शराबी सबसे बड़ा टैक्स पेयर है। 1947 से पहले हमारे देश में उन्ही लोगों को वोट देने का अधिकार था जो लोग सरकार को टैक्स देते थे। आखिर अधिकार के बदले कर्तव्य भी तो निभाना पडता है। आज भी हमारे देश मे ऐसे लोग हैं जो सरकार को देने के नाम पर तो जीरो हैं, लेकिन जब लेना हो तो सबसे बड़ा लाईन उन्हीं लोगों का है।

शराब हमारे देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। तभी तो देश के कई राज्य सरकार इस पर पाबंदी नहीं लगा पाई है। एक बात और लाॅकडाउन सबकुछ बंद है, लेकिन जगह-जगह से शराब की बोतले पकड़ी जा रही है। आखिर कही-न-कही उसका उत्पादन तो हो रही रहा है। आखिर शराब को बंद कैसे किया जा सकता है, बहुत से लोगों के लिए यह जीवन है और जो लोग इतने बड़े पैमाने पर लाईन में लगकर सरकार को टैक्स दे रहे हैं, उनके बारे में तो सोचना ही चाहिए।

फिर भारत में तो हाईप्रोफाईल लोगो के जीवन शैली में शराब को जोड़ दिया गया है। भले ही यह हमारे समाज के लिए कलंक हो लेकिन इन लोगों के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गया है। भले ही यह हमारी सभ्यता नहीं रही हो, लेकिन वामपंथियों ने इसे हमारे इतिहास में लिखकर इस देश और अपने भारत माँ को कलंकित करने में कोई कसर नही छोड़ा है। इनकी चेहरा तो कुछ ऐसा ही है, जैसा प्रकाश झा की फिल्म लिपिस्टिक अन्दर बुर्का की कहानी है।

शराब  अछूता तो नहीं है। चाहे वो अफसर हो या राजनीतिज्ञ। चाहे हमारे जैसे विचार देने वाले तथा कथित पत्रकार ही क्यों न हो ! बस क्वालिटी का फर्क है। कुछ लोग   देशी ब्रांड पीते हैं तो कुछ विदेशी ब्रांड। देशी वालों को शराबी और विदेशी पीने वालों को लाइफ स्टाईल कहा जाता है। यह भी सोच का दोगलापन है, क्योंकि देशी से ज्यादा विदेशी पीने वाले इस देश में समाज को कलंकित कर रहे हैं। विदेशी पीने वालों में भारत के उच्च घराने के और पढी लिखी महिलाएँ भी शामिल होती हैं, लेकिन हम उन्हें चरित्रहीन नहीं कह सकते हैं।