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पलायन की भीड़ किब देखकर खुद से सवाल करना भी जरूरी
March 29, 2020 • सुरेश चौरसिया

 

राहुल कोटियाल की कलम से

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नई दिल्ली। कौन हैं ये लोग जो किसी भी हाल में बस अपने घर-गाँव पहुँच जाना चाहते हैं? कौन हैं जो लॉक डाउन का मतलब नहीं समझ रहे? कौन हैं जो गाड़ियाँ बंद होने पर सैकड़ों किलोमीटर पैदल ही चलने को तैयार थे?

ये तमाम वो लोग थे जिन्हें सिर्फ़ एक बात समझ आती है, ‘लॉक डाउन में बाहर निकले तो शायद मर जाएँ लेकिन नहीं निकले तो पक्का मर जाएँगे।’

ऐसा क्यों? क्योंकि ये तमाम लोग उस आय वर्ग से आते हैं जहां रोज़ कुआँ खोदने पर ही पानी मिलता है। 21 दिनों के लॉक डाउन का इनके लिए सीधे-सा एक ही मतलब होता है - 21 दिनों की रोटी बंद। 

इनके पास न तो ‘वर्क फ़्रोम होम’ की सुविधा होती है और न इतना जमा पैसा कि 21 दिन बिना कोई काम किए अपने मूलभूत खर्चे पूरे कर सकें। रोज़ खटते हैं तब जाकर ज़रूरतें पूरी होती हैं। 

ये सभी लोग असुरक्षा के चलते भाग रहे थे। असुरक्षा इस बात की कि '21 दिनों तक यहीं रहें तो खर्चे कैसे पूरे होंगे? झुग्गी का किराया कैसे देंगे? खाएँगे क्या? बच्चों को क्या खिलाएँगे?’ ऐसे मूलभूत सवालों का भी जब कोई जवाब नहीं सूझता, तब ये लोग बच्चों को कंधों पर बिठाए हज़ार किलोमीटर पैदल ही चलने की सोचते हैं। 

ये सही है कि तमाम सरकारों ने आदेश दिए हैं कि निम्न वर्ग के लोगों तक राशन मुफ़्त पहुँचा दिया जाएगा। कुछ सरकारों ने ये भी आदेश दिए हैं कि इस लॉक डाउन के रहने तक निम्न वर्ग के लोगों से कमरे का किराया न वसूला जाए। लेकिन ये तमाम घोषणाएँ तब हुई हैं जब हज़ारों लोग असुरक्षा के चलते घर छोड़ कर निकल चुके थे। और अब भी ये घोषणाएँ धरातल से बहुत दूर हैं। 

इस परिस्थिति के लिए सवाल करने हैं तो सरकारों से कीजिए। क्या सरकारों ने इन लोगों को आश्वस्त किया था कि आपको घबराने की ज़रूरत नहीं है, हम मदद के लिए खड़े हैं। जिन बस्तियों में ये तमाम लोग रहते हैं, वहाँ अगर पहले या दूसरे दिन भी रसद पहुंच गई होती तो ये लोग ऐसे विचलित न होते। इनके मोहल्लों-बस्तियों-झुग्गियों में अगर घोषणा की गई होती कि ‘लॉक डाउन के दौरान मकान मालिक कमरे का किराया नहीं वसूलेंगे’ तो इन लोगों की घबराहट कुछ कम हो गई होती। 

ये लोग ट्विटर पर नहीं होते जो देख सकें कि मुख्यमंत्री ने क्या आदेश जारी किया है। ये फ़ेसबुक पर भी नहीं होते जो देख सकें कि सोशल मीडिया का विमर्श किधर जा रहा है। ऐसे में इन लोगों को आश्वस्त करना कि सरकार इनके साथ है, ये ज़िम्मेदारी किसकी थी? 

जिस आदमी के एक बार कहने से पूरा देश थालियाँ पीटने लगा था, क्या उस आदमी को इस वक्त आगे आकर इन लोगों को आश्वासन नहीं देना चाहिए? ये बहुत बड़ा वर्ग जिसकी चुनौती ये है कि ‘कोरोना से पहले तो हम भूख से मर जाएँगे’, इस वर्ग को विचलित देख क्या उस प्रधान को लाइव नहीं आना चाहिए था?

अव्वल तो ये आश्वासन लॉक डाउन की घोषणा के साथ ही दे दिए जाने चाहिए थे कि ‘प्रवासी मज़दूरों, निम्न आय वर्ग के लोगों को घबराने की ज़रूरत नहीं है। वे जहां हैं वहीं बने रहें, उन तक सारी मदद पहुँचती रहेगी।’ लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बल्कि हुआ ये कि प्रधान के घोषणा करते ही लॉक डाउन टूट गया। और इसे तोड़ने वाले ये गरीब लोग नहीं बल्कि मध्यम और उच्च वर्ग के लोग थे। प्रधानमंत्री का भाषण ख़त्म होने से पहले ही ये बाज़ारों की तरफ़ दौड़ पड़े, राशन लाकर घरों में ठूँस चुके हैं और अब चाय की चुस्कियों के साथ इस वर्ग को ग़ैर-ज़िम्मेदार बता रहे हैं। 

दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने भले ही लोगों के खाने की व्यवस्था पहले दिन से की लेकिन उन्होंने भी विचलित होकर दिल्ली छोड़ते इस वर्ग को सुरक्षित महसूस करवाने के लिए कुछ नहीं किया। चुनाव के दिन एक-एक गली तक इन पार्टियों की गाड़ियाँ पहुंच जाती हैं और एक-एक वोटर को पोलिंग बूथ ये लोग ले जाते हैं। लेकिन इस वक्त इनसे इतना नहीं हुआ कि जिन बस्तियों से लोग निकल रहे थे सिर्फ़ उन बस्तियों में पहुंच कर लोगों को आश्वस्त कर आते, उन्हें मदद पहुँचा देते, विश्वास दिला देते कि वो यहां सुरक्षित हैं। 

अब स्थिति हाथ से निकल चुकी है। आनंद विहार पर हज़ारों-हज़ार लोग उमड़ पड़े हैं। स्वाभाविक है इनमें सभी ‘मरता क्या न करता’ वाली स्थिति वाले नहीं होंगे बल्कि कई ऐसे भी होंगे जो बसों के चलने को एक ‘विंडो’ की तरह देख रहे होंगे ताकि अपने-अपने घर पहुँच सकें। लेकिन इस स्थिति का दोष इन्हीं पर मढ़ देना ठीक नहीं है। 

ये सही है कि लॉक डाउन ही मौजूदा वक्त में एक मात्र विकल्प था। जो लोग कह रहे हैं कि लॉक डाउन से पहले जनता को अपने-अपने ठिकानों पे जाने का मौक़ा देना चाहिए था, मैं इस तर्क से इत्तेफ़ाक नहीं रखता। ये आपात स्थिति है और भयावह है। लॉक डाउन का मतलब ही था जो जहां है वहीं बना रहे, ताकि संक्रमण फैलने से बचाया जा सके। यही गलती इटली ने की, पहले हल्के में लिया, फिर लोग अपने-अपने ठिकानों पर भागे, और अब वहाँ की तस्वीर आप देख ही रहे हैं। लिहाज़ा लॉक डाउन का फैसला तो हमें और भी पहले लेना था। लेकिन तब तो हम थालियाँ पीट रहे थे।

लॉक डाउन तुरंत करना ज़रूरी था। मान लिया कि इसकी तैयारी के लिए वैसा स्कोप नहीं था जैसा नोटबंदी में होते हुए भी ज़ाया किया गया। लेकिन इसके बाद तो चीज़ें प्लान की जा सकती थीं। 

इन लोगों पर सवाल करने से पहले ये सवाल कीजिए कि तमाम इंटेलिजेन्स से लेकर सलाहकारों की फ़ौज और कथित जेम्स बॉड से लेकर चाणक्य तक सब क्या कर रहे थे जो ये स्थिति पैदा हुई।