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क्या प्रत्येक व्यक्ति में भगवान विराजमान हैं, तो कैसे ?
February 14, 2020 • सुरेश चौरसिया

ईश्वर अंश जीव अविनाशी, यह तो अपने सुना ही होगा। हर जीवों में भगवान हैं। अर्थात जीव भगवान का स्वरूप है। तो फिर जीव भगवान से दूर क्यों रहता है। चूंकि मनुष्य के अंदर प्रभु को दर्शन करने की आध्यात्मिक क्षमता है, बाकी तो भोग योनियां हैं। 

स्वामी विवेकानंद दक्षिणेश्वर मंदिर के बाहर विचारमग्न बैठे हुए थे। मंदिर से एक व्यक्ति बाहर निकला। उसने स्वामी जी को पहचान कर प्रणाम किया और पूछा, ‘भगवान के दर्शन कैसे किए जा सकते हैं?

स्वामी जी ने उससे पूछा, ‘तुम कहां से आ रहे हो?’ उसने बताया कि वह मंदिर में प्रभु के दर्शन करके आ रहा है। ‘जब दर्शन करके ही आ रहे हो, तो यह क्यों पूछते हो कि भगवान के दर्शन कैसे हों? क्या तुमने मंदिर के अंदर काली मां के दर्शन नहीं किए? क्या उन्हें केवल पत्थर की मूर्ति समझकर निहारा?’ विवेकानंद जी ने अगला प्रश्न किया।

यह सुनते ही वह सकपका गया। स्वामी जी ने कुछ क्षण रुककर फिर कहा, ‘प्रत्येक व्यक्ति में भगवान विद्यमान है। प्रत्येक आत्मा ही अव्यक्त ब्रह्म है। बाह्य एवं अंत:प्रकृति का नियमन कर इस अंतर्निहित ब्रह्म-स्वरूप को अभिव्यक्त करना ही जीवन का ध्येय है।’

विवेकानंद जी लिखते हैं, ‘ईश्वर के दर्शन दुखी मानव में किए जा सकते हैं। यदि अंत:करण भूख से पीड़ित, कराहते हुए बीमार को देखकर द्रवित हो उठे, तो समझना चाहिए कि आप परमात्मा की ओर बढ़ रहे हैं। यह विश्वास करना चाहिए कि जीवन और मृत्यु, सुख और दुख आदि में ईश्वर समान रूप से विद्यमान है। समस्त संसार ईश्वर का रूप है। ईश्वर पूजा आत्मा की ही उपासना है।’

स्वामी जी अपने उपदेश में कहते हैं कि ‘प्रेम व करुणा में इतनी शक्ति है कि वह भगवान को आपके पास आने को विवश कर सकती है, इसलिए निराशा त्यागकर सेवा-परोपकार के मार्ग पर चलते रहो।’