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क्या है तुलसीदास कृत रामायण में कोरोना रोग और ईलाज ?
April 24, 2020 • सुरेश चौरसिया

गोस्वामी तुलसीदास दास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में उत्तरकाण्ड के अन्तर्गत कई रोगों की सटीक जानकारी व इस पर विस्तृत विवेचना की है। गोस्वामीतुलसीदास ने इस महामारी के मूल स्रोत चमगादड के विषय में उत्तरकाण्ड के दोहा १२० (14) में वर्षो पहले ही बता दिया था, जिससे आज सभी लोग दुखी हो रहे हैं।

सबके निंदा जे जड़ करहीं।
ते चमगादुर होइ अवतरहीं।।
सुनहु तात अब मानस रोगा।
जिन्ह ते दु:ख पावहिं सब लोगा।।

गोस्वामी जी मानस में लिखते हुए बताते हैं कि हे मानव जो मूर्ख मनुष्य सबकी निन्दा करते हैं, वे चमगादड़ के रूप में जन्म लेते हैं।

हे तात ! मैं अब तुम्हें  मनुष्य के रोगो के सम्बन्ध में बताता हूँ। ध्यान से सूनो जिनके कारण सब लोग बहुत दुख पाया करते हैं।

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।
तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।।
काम बात कफ लोभ अपारा।
क्रोध पित्त नित छाती जारा।।

इस महामारी के लक्षणों के बारे में गोस्वामी जी आगे लिखते हैं कि हे मानव इन सब रोगों की जड़ मोह अर्थात अज्ञान है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं।
जिसमे उन्होंने यह बता ही दिया है कि इसमें काम वात है लोभ अपार ( बड़ा हुआ) कफ़ है और क्रोध पित्त है जो सदैव छाती को जलाता रहता है, जिससे शरीर में खांसी बढ़ जायेगी और फेफड़ो में एक जाल या आवरण उत्पन्न होगा या कहें  lungs congestion जैसे लक्षण उत्पन्न हो जायेंगे।

प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। 
उपजइ सन्यपात दुखदाई।।
बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। 
ते सब सूल नाम को जाना।।

गोस्वामी जी द्वारा यह भी बताया गया कि यदि यह तीनों भाई (वात-पित्त-कफ) आपस में प्रीति करलें अर्थात आपस में मिल जाये तो इन सबके मिलने से अत्यन्त दुखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है, जो बहुत ही शूल अर्थात कष्टदायक रोग है, जिनके नाम भी अपार है।

जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। 
कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका।।

गोस्वामी जी बताते हैं कि मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर होते हैं, ऐसे ही अनेको प्रकार के बुरे रोग है, जिनका वर्णन करना सम्भव नहीं है।

वे फिर इसके आगे भी लिखते हुए आगाह करते हैं :

एक ब्याधि बस नर मरहिं 
ए असाधि बहु ब्याधि।
पीड़हिं संतत जीव कहुँ
सो किमि लहै समाधि॥ 

जब इस प्रकार के एक ही रोग बीमारी फैलने के कारण लोग मर जाते है, फिर यह तो बहुत से असाध्य रोग हैं जो जीव को निरन्तर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी स्थिति-दशा में वह समाधि (शान्ति) को किस प्रकार प्राप्त कर सकेगे ?

नेम धर्म आचार तप 
ग्यान जग्य जप दान।
भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं 
रोग जाहिं हरिजान॥

नियम,धर्म,आचार (उत्तम आचरण), तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ों औषधियाँ हैं, परंतु हे गरुड़ जी उनसे यह सब रोग जाने वाले नहीं है ।

ऐसी स्थिति मे इन सबके परिणाम स्वरुप क्या क्या होगा इस पर गोस्वामी जी लिखते हैं :-

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। 
सोक हरष भय प्रीति बियोगी॥
मानस रोग कछुक मैं गाए। 
हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए॥

इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व के जीव तो रोग ग्रस्त हैं ही इसके साथ ही साथ वे सभी शोक, हर्ष, भय, प्रीति और अपनों के वियोग-दुख के कारण और भी दुखी हो रहे हैं। 

गोस्वामी जी कहते हैं कि मैंने यह थोड़े से मानस-रोग कहे हैं। वैसे तो यह रोग सबको ही हैं, परंतु इन्हें कोई विरले ही जान व समझ पायेगे अर्थात सबको यह रोग होने पर भी बहुत कम लोगों को ही ठीक से detect हो पायेगा।

आज आम लोगो की क्या कहें, इस संसार की बड़ी बड़ी हस्तियाँ भी इस रोग से ग्रसित होती जा रही हैं।

इस विषय में गोस्वामी जी ने पहले से लिख  दिया था।

जाने ते छीजहिं कछु पापी। 
नास न पावहिं जन परितापी।।
बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। 
मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे।।

प्राणियों को जलाने वाले ये पापी (रोगों) की जानकारी प्राप्त हो जाने से यह रोग कुछ समय के लिये क्षीण तो अवश्य हो जाते हैं,परंतु इनका नाश नहीं होता। 

यह रोग विषय रूपी कुपथ्य को पाकर मुनियों के हृदय में भी अंकुरित हो उठते हैं, तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज हैं, वह इस मर्म को कैसे समझ पायेगें॥

अर्थात रोग पहचान लिए जाने पर या रोग के लक्षणों द्वारा रोग की पुष्टि हो जाने पर उन लक्षणों का इलाज किये जाने के पश्चात भी यह रोग पुन: उभर जाते हैं।

यदि हम चाइना के लोगो पर एक दृष्टि डाले कि जो लोग ठीक हो कर घर भी चले गये थे उनमे भी कुछ दिनों बाद बिना कोई लक्षण दिखाई दिये उन सभी के उपर पुनः इस रोग के होने की पुष्टि हुई ।

अब सभी यह जानना चाहेंगे कि फिर इस महामारी से हमे मुक्ति कैसे  मिलेगी तो इस विषय पर गोस्वामी जी लिखते हैं कि:-

राम कृपाँ नासहिं सब रोगा।                                           जौं एहि भाँति बनै संजोगा॥
सदगुर बैद बचन बिस्वासा।                                      संजम यह न बिषय कैआसा।।

गोस्वामी जी का कथन है कि यदि श्रीराम जी की कृपा से इस प्रकार का संयोग बन जाय तो यह सब रोग नष्ट हो जायें, लेकिन यह तभी सम्मव है जब सदगुरू रूपी बैद्य जी के वचन में विश्वास हो तथा किसी भी प्रकार के विषयों की आशा न करे और संयम अर्थात परहेज से रहे।

रघुपति भगति सजीवन मूरी।                                      अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥
एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं।
नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥

हे मानव श्री रघुनाथ जी की भक्ति संजीवनी जड़ी है तथा श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवा के साथ लिया जाने वाला मधु आदि) है।

इस प्रकार का संयोग तथा श्रीराम जी की कृपा हो तो यह समस्त रोग नष्ट हो जाएगें अन्यथा करोड़ों प्रयत्नों से भी यह रोग जाने वाले नहीं है॥

इसलिये सभी से सादर प्रार्थना है कि भगवान श्रीराम पर श्रद्धा-विश्वास और पूर्ण भरोसा रखते हुये केवल और केवल उनकी शरणागति प्राप्त करें, जिसने भी भगवान पर भरोसा किया सबका कल्याण ही हुआ और अब आपका भी मंगल ही होगा। जय जय श्री सीताराम।

                *   ईo/पंo सुन्दर लाल उनियाल, दिल्ली/                               इन्दिरापुरम, गाoबाद/देहरादून