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हिन्दू कभी साम्प्रदायिक नहीं हो सकता : चंद्रपाल प्रजापति
April 28, 2020 • सुरेश चौरसिया

हिन्दू जीवन कभी साम्प्रदायिक नही हो सकता। यह कहना है नोएडा के जागरूक व्यक्ति चंद्रपाल प्रजापति का। उन्होंने कहा, झारखंड के जमशेदपुर में फल की दुकानों पर हिन्दू फल की दुकान लिखने पर फल दुकानों से पोस्टर हटवा दिया गया तथा संबंधित दुकानदारों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करा दिया। वहीं मुस्लिम होटल आदि लिखने पर कहीं कोई आपत्ति नही है।

चंद्रपाल ने कहा कि हिन्दू धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म है। वसुधैव कुटुम्बकम् हिन्दू धर्म का मूल संस्कार तथा विचारधारा है अर्थात समस्त धरती एक ही परिवार है। नागपुर में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा था, ‘पश्चिम में जो राष्ट्र विकसित हुए उनका आधार एक विशिष्ट भूमि, भाषा, रिलीजन और समान शत्रु रहा है, जबकि भारत की राष्ट्रीयता का आधार वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया का चिंतन रहा है। भारत ने सदैव समूचे विश्व को एक परिवार के रूप में देखा है। भारत सभी के सुख और निरामयता की कामना करता रहा है। हिन्दू कभी साम्प्रदायिक नही हो सकता है।

हम में से हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में उपभोक्ता है। आज उपभोक्ता जमाखोरी, कालाबाजारी, मिलावट, अधिक दाम, कम नाप-तौल इत्यादि संकटों से घिरा है। उपभोक्ताओं को जीवन एवं संपत्ति के लिए हानिकारक सामान और सेवाओं की बिक्री के खिला़फ सुरक्षा का अधिकार, अनुचित व्यापार पद्धतियों या उपभोक्ताओं के शोषण के विरुद्ध निपटान का अधिकार है। 

उन्होंने बताया कि आज सोशल मीडिया के काल में जब हर नागरिक जागरूक है और वो समझता है। जब उसको विभिन्न तरह की वीडियो मिलती है जो उसके संशय को प्रबल करती है कि जो समान वो खरीदेगा वो जोखिम भरा है। इसलिए समाज को  हिन्दू फल विक्रेता लिखने के लिए विवश होना पड़ता है। हिन्दू फल की दुकान लिखने में गलत क्या है और पुलिस ने किस कानून के तहत कार्रवाई की है। सोशल मीडिया पर लोगों का सवाल है कि क्या यही कदम 'हलाल' या 'मुस्लिम होटल' लिखे हुए होटल, रेस्तरां और दुकानों के खिलाफ उठाया जाएगा। पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी इस घटना की निंदा करते हुए कहा है कि फल विक्रेताओं के साथ किया गया पुलिस का व्यवहार निंदनीय है। उन्होंने कहा कि आजीविका चला रहे छोटे-छोटे व्यापारियों को तुष्टीकरण की राजनीति के चलते तंग करना सही नही है। 

उपभोक्ता को अधिकार है वह किस विक्रेता से सामान ले, किस से ना ले।इसके लिए कोई सरकार या कानुन उसे बाध्य नहीं कर सकता है। अगर किसी को दूध अमूल का लेना है या मदर डेयरी का यह वह तय करेगा, इसी तरह विक्रेता को फल या सब्जी किससे खरीदनी है यह वह तय करेगा। इस संकट के समय जब अपने परिचितों से भी व्यक्ति 2 मीटर की दूरी बना कर रख रहा है तब एक अपरिचित दुकानदार या ठेले वाले पर कोई भी कैसे विश्वास कर सकता है।