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बिहार में लॉकडाउन की त्रासदी और बिहार से पलायन करने वाले श्रमिकों का दर्द
May 17, 2020 • सुरेश चौरसिया

पटना। १९९० में एक युग आया था बिहार में जब दलितों, पिछड़ों, बंचितो में एकाएक बदलाव आया। मुंह में जवान, आत्मविश्वास की आशा झलकी थी। बदलने लगा था बिहार लेकिन फिर महत्त्वाकांक्षाओं के दलदल में नेता वहकने लगे।

१९७४ के आंदोलन से प्रभावित जयप्रकाश नारायण के आदर्शों पर एक जूट हुए ये युवक लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, राम विलास पासवान, सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद आदि युवाओं ने जो बिहार को एक आदर्श स्थान दिला सकते थे।  लेकिन वे अपने आप को मजबूत बनाने में लग गये और जनता जनार्दन को फिर जात- पात के दलदल में धकेल दिया।

ये बंचित बिहारियों ने कई राज्यों को आबाद किया। अगर कोई बिहारी कुछ बन गया तो उसने भी नेताओं की तरह अपने बिहारियों की सुध लेने से कतराते रहे। आज रोटी मिले या न  मिले , कपड़ा पहनने को वेशक, न हो रहने को, भले ही छप्पड़ न हो, लेकिन अपने आप को सबसे बड़ा राजनीतिज्ञ मानता है और समझदार मतदाता। लानत है ऐसी जागरूकता की जहां बिहारियों ने कभी बिहार के हर क्षेत्र में गिरते स्तर को समझने की चेष्टा ही नहीं की।

यहां जयप्रकाश नारायण के बाद जो भी नेता पैदा हुआ वह परिवारवाद से बाहर निकलने को कभी कोशिश नहीं किया। जमकर लूटा, जमकर दोहन किया और वह ठेठ बिहारी भाषा का इस्तेमाल कर अपने ही प्रदेशवासियों को धोखा दिया। प्रतिफल बड़ी संख्या में बिहार के लोग देश के अन्य भागों में रोजी-रोटी के लिए प्रस्थान कर गए और आज लॉकडाउन की विभीषिका में वह अपने प्रदेश के लिए लौट रह हैं। तो बिहार के बाहरी राज्यों में इन श्रमिक मजदूरों पर बर्बरता का तांडव रचाया रहा है। कहीं मुर्गे बनाया जा रहा है, तो कहीं उठक बैठक कराया जा रहा है, तो कहीं पैसे छीनने के मामले भी सामने आ रहे हैं। लानत है ऐसी व्यवस्था पर जिसने बिहार की तस्वीर को गरीबी के दलदल में धकेला है। बिहार में कुदरत ने जितनी वैभवता दिया था, उसका भरपूर दोहन हुआ और  बिहार को टुकड़े कर लोगो को टुकड़ों पर जीने को मजबूर किया गया है।