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आज भारत की हाइड्रॉक्सिक्लोरोक्वीन दवा दुनिया में क्यों है चर्चित, जरूर जानें
April 13, 2020 • सुरेश चौरसिया

नोएडा। आज दुनिया में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवाई की बड़े चर्चे हैं। यह एक पुरानी और सस्ती दवा है, जिसका इस्तेमाल मलेरिया के इलाज के लिए किया जाता है। इसका कोरोना के उपचार में भी अच्छा असर देखा गया है। भारत वैश्विक स्तर पर इस दवा का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा भारत से इस दवाई की मांग पर दुनिया का इस पर ध्यान गया है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मलेरिया रोधी ‘हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन’ दवा ना देने पर भारत को कड़े परिणाम भुगतने की चेतावनी देने के कुछ घंटों बाद ही  भारत ने कुछ देशों को उचित मात्रा में पैरासिटामोल और मलेरिया रोधी दवा ‘हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन’ के निर्यात को अस्थायी तौर पर मंजूरी दे दी।

आज हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन दवा कोरोना वायरस संक्रमण के दौरान दुनियाभर में चर्चा का विषय बनी हुई है। कोरोना की रोकथाम के लिए कोई दवा नहीं है लेकिन हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन को इस वायरस से लडऩे में कारगर माना जा रहा है। भारत में हर साल बड़ी संख्या में लोग मलेरिया की चपेट में आते हैं, इसलिए भारतीय दवा कंपनियां बड़े स्तर पर हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन का उत्पादन करती हैं। दिलचस्प बात यह है कि अमरीका जैसे देशों में यह दवा कोरोना वायरस के मरीजों को दी जा रही है और सहायक भी साबित हो रही है। इसी वजह से इसकी मांग और बढ़ गई है। हालांकि, हाल ही के दिनों में भारत में इस दवा के उत्पादन में थोड़ी कमी आई है। 

भारत में हर महीने करीब 40 टन एच.सी.क्यू. का उत्पादन होता है, यानी 200 एम.जी. के 20 करोड़ टैबलेट लेकिन दवा कंपनियां अपनी क्षमता और बढ़ा रही हैं और इसे अगले महीनों में बढ़ाकर 70 टन तक किया जा सकता है। जानकारों का कहना है कि भारत को हर साल एच.सी.क्यू. के करीब 2.5 करोड़ टैबलेट की ही जरूरत होती है, यानी इसका उत्पादन भारत की अपनी जरूरतों से कई गुना ज्यादा निर्यात के लिए ही होता है। अब इसमें अगर कोविड-19 से निपटने और उपचार में इस्तेमाल को भी जोड़ दिया जाए तो भी भारत के पास उत्पादन क्षमता बहुत ज्यादा है।

हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन दवा से इम्यून सिस्टम अति सक्रिय किया जा सकता है। इसे 1940 से मलेरिया और गठिया जैसी बीमारियों के इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अमरीका में इस दवाई को सामान्य रूप से ‘प्लेक्यूनिल ब्रांड’ नाम के तहत बेचा जाता है। डॉक्टर्स इस दवाई को किसी दूसरी बीमारी (ऑफ लेबल) में भी खाने के लिए दे सकते हैं। जैसे आजकल कई सारे लोग इस दवाई को कोरोना वायरस के इलाज के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

भारत में हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन (एच.सी.क्यू.) की सबसे बड़ी उत्पादक कंपनियां हैं-इप्का लैबोरेटरीज, कैडिला समूह की जाइडस कैडिला और वॉलेस फार्मास्यूटिकल्स। इप्का इस दवा की दुनिया की सबसे बड़ी उत्पादक है। इसके अलावा इन्टास फार्मा, सिप्ला, ल्यूपिन जैसी कंपनियां भी कुछ उत्पादन करती हैं। फार्मास्यूटिकल मार्कीट रिसर्च फर्म ऑल इंडियन ओरिजन कैमिस्ट्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर लि. (ए.आई.ओ.सी.डी.) के अनुसार हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्वीन ने फरवरी 2020 तक 12 महीने में 152.80 करोड़ रुपए का कारोबार किया। हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन टैबलेट्स के उत्पादन में भारत की मदद ब्राजील और चीन करते हैं। इसके लिए जरूरी कच्चे माल की  आपूर्ति ब्राजील और चीन से ही होती है। एक अनुमान के अनुसार हर कोविड-19 मरीज को एच.सी.क्यू. के 14 टैबलेट का कोर्स दिया जाता है, इसका मतलब यह है कि भारत सरकार ने जो 10 करोड़ टैबलेट का ऑर्डर दिया है उससे करीब 71 लाख लोगों का इलाज किया जा सकता है। पिछले वित्त वर्ष 2019-20 के अप्रैल से जनवरी के बीच भारत ने 1.22 अरब डॉलर मूल्य के हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्वीन ए.पी.आई. का निर्यात किया था। इसी दौरान हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन फॉर्मूलेशन का निर्यात 5.50 अरब डॉलर का किया गया। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने इसकी सिफारिश की है कि एच.सी.क्यू. का इस्तेमाल कोविड-19 के प्रीवैंटिव मैडिकेशन में किया जा सकता है।

हालांकि यह दवा एंटी-मलेरिया ड्रग क्लोरोक्वीन से थोड़ी अलग दवा है। यह एक टैबलेट है, जिसका उपयोग ऑटोइम्यून रोगों जैसे कि संधिशोथ के इलाज में किया जाता है, लेकिन इसे कोरोना से बचाव में इस्तेमाल किए जाने की बात भी सामने आई है। इस दवा का खास असर सार्स-सी.ओ.वी.-2 पर पड़ता है। यह वही वायरस है जो कोविड-2 का कारण बनता है और यही कारण है कि हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन के टैबलेट्स कोरोना वायरस के मरीजों को दिए जा रहे हैं। इसके अलावा आर्थराइटिस के उपचार के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। 

पिछले महीने अमरीकी फूड और ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इप्का के दो प्लांट पर लगाए ‘इम्पोर्ट अलर्ट’ को हटा दिया ताकि उसकी दवाओं का आयात किया जा सके। इसी प्रकार जाइडस कैडिला को भी अमरीका से ऑर्डर पहले ही मिल गया है। भारत ने गत 25 मार्च को ही एच.सी.क्यू. के निर्यात पर रोक लगाई थी।

दुनिया भर में कोरोना वायरस का संक्रमण फैला है और भारत इस दवाई का सबसे बड़ा निर्यातक है। एक रिपोर्ट के मुताबिक अमरीका सहित दुनिया के करीब 30 देशों ने भारत से इस दवा की मांग की। 

इस दवा के साइड इफैक्ट में सिर चकराना, सिर दर्द, मूड का खराब होना, स्किन में खुजलाहट, सूजन, क्रैम्प, स्किन का पीला पड़ जाना, मांसपेशियों में कमजोरी, नाक से खून बहना और सुनने में दिक्कत होना शामिल हैं। ओवरडोज से मौत तक हो सकती है। इसलिए स्वास्थ्य मंत्री डा हर्षवर्धन निर्देश दिया है कि सिर्फ चिकित्सकों के परामर्श पर ही यह दवा मरीजों को दी जाए। 
देश में अनेक स्थानों पर तैयार होने वाली इसकी गोलियां (टैबलेट) उत्तराखंड के देहरादून में भी बनती हैं। देहरादून के सेलाकुई स्थित सारा फार्मा सिटी स्थित आई.पी.सी. ए. लिमिटेड (इप्का) लैबोरेटरीज नामक फैक्टरी में एच.सी.क्यू.एस. टैबलेट निर्मित की जाती हैं।

इंटरनैशनल मार्कीट में इन दिनों इस दवाई की डिमांड बढ़ गई है। इस कारण हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्वीन को स्टॉक में रख दिया गया है। डीलर बिना लाइसैंस किसी को भी यह दवा नहीं दे रहे हैं। इस दवा का बड़ा स्टॉक वाराणसी में उपलब्ध है। यहां से पूरे पूर्वांचल में इस दवाई की सप्लाई होती है। यहां फिलहाल 2 लाख टैबलेट हैं और डिमांड को देखते हुए 10 लाख टैबलेट और मंगाई जा रही हैं। 

हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन दवाई के ऊपर प्रारंभिक शोध में कई विवादास्पद परिणाम सामने आए हैं हालांकि एक लैब ने अपनी स्टडी में बताया कि इस दवाई से वायरस को सैल्स के अंदर जाने से रोका जा सकता है। चीन से एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस दवाई के जरिए 10 अस्पतालों में 100 लोगों का इलाज किया गया लेकिन उन सभी लोगों को कई तरह की बीमारियां थीं। इसके अलावा अलग-अलग समय पर कई तरह की दवाइयों से उनका इलाज किया गया था। चीन से एक और शोध निकलकर सामने आया कि हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्वीन के इस्तेमाल से 31 लोगों की खांसी और निमोनिया बहुत जल्द ठीक हो गया जबकि बाकी 31 लोग बिना इसके इतनी जल्दी ठीक नहीं हुए।